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असहमति का अधिकार लोकतंत्र की विशेषता, सरकार की गलत कार्यों की पूरी आलोचना होनी चाहिए: सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज

असहमति का अधिकार लोकतंत्र की विशेषता, सरकार की गलत कार्यों की पूरी आलोचना होनी चाहिए: सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज

जस्टिस दीपक गुप्ता. (फोटो साभार: विकिपीडिया)

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस दीपक गुप्ता ने एक कार्यक्रम के दौरान कहा कि यदि कोई पार्टी सत्ता में आ जाती है तो वो आलोचनाओं से परे नहीं रह सकती है. असहमति का अधिकार ऐसी आलोचनाओं की इजाज़त देता है.

नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस दीपक गुप्ता ने बीते शुक्रवार को कहा कि कोई भी पार्टी आलोचनाओं से वंचित नहीं रह सकती है और प्रतिरोध की आवाज दबाने के लिए राजद्रोह कानून का इस्तेमाल सही नहीं है.

लीगल न्यूज पोर्टल लाइव लॉ के साथ मिलकर दिल्ली हाईकोर्ट विमेन लॉयर्स फोरम द्वारा ‘अवर राइट टू डिसेंट’ विषय पर आयोजित एक वेबिनार के दौरान जस्टिस गुप्ता ये बातें कही.

इस कार्यक्रम में जस्टिस गुप्ता के अलावा वरिष्ठ वकील रेबेका जॉन और वकील चित्रांशुल सिन्हा के साथ-साथ वकील ऋतु भल्ला और मनाली सिंघल शामिल थे. इसके अलावा वकील अरुंधति काटजू और स्वाति सिंह मलिक भी इसका हिस्सा थीं.

उन्होंने ब्रिटिश शासन के दौरान राजद्रोह आरोपों का सामना किए बाल गंगाधर तिलक और महात्मा गांधी के अनुभवों को साझा करते हुए कहा, ‘असंतोष इतना बड़ा शब्द है कि इसके चलते किसी भी चीज को राजद्रोह बताया जा सकता है. हमारा संविधान बोलने एवं अभिव्यक्ति की आजादी देता है. असहमति का अधिकार लोकतंत्र की विशेषता है. यदि कोई पार्टी सत्ता में आ जाती है तो वो आलोचनाओं से परे नहीं रह सकती है. असहमति का अधिकार ऐसी आलोचनाओं की इजाजत देता है.’

उन्होंने आगे कहा, ‘दोषसिद्धि दर को देखिए, ये कितना कम है. व्यक्ति की प्रतिष्ठा तब खराब होती है, यदि एक व्यक्ति को भी दोषी नहीं ठहराया जाता है. यदि हम प्रतिरोध का दमन करते हैं तो कोई भी विकास नहीं हो सकता है. पिछले 9-10 सालों से हमने व्यंग की समझ को खत्म कर दिया है. आज मैं अपने करीबी लोगों से भी मजाक करने से डरता हूं कि कहीं उन्हें बुरा न लग जाए.
उन्होंने कहा कि लोगों को बंटने के बजाय एक होना चाहिए. ये पूछे जाने पर कि क्या प्रतिरोध की आवाज दबाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट को संज्ञान लेना चाहिए, जस्टिस गुप्ता ने कहा कि हर एक मामले में स्वत: संज्ञान नहीं लिया जा सकता है.

उन्होंने कहा, ‘सुप्रीम कोर्ट हर एक मामले में स्वत: संज्ञान नहीं ले सकता है. लेकिन मेरा मानना है कि उच्च न्यायालयों को इन मामलों को देखना चाहिए. ऐसा करने के लिए उन्हें अधिकार प्राप्त है. मनाली सिंघल बताती हैं कि किस तरह उनकी बेटी श्रेया ने दिशा रवि की उम्र में आईटी एक्ट की धारा 66 ए को चुनौती दी थी. अब सरकार के खिलाफ किसी भी विरोध को राष्ट्र-विरोधी के रूप में देखा जाता है.’

इसके साथ ही जस्टिस गुप्ता ने पूरी न्यायपालिका पर ही कीचड़ उछालने को लेकर लोगों को चेताया.

उन्होंने कहा, ‘आप कुछ फैसलों की वजह से पूरी न्यायपालिका को कलंकित करके अधिक नुकसान पहुंचाते हैं. अच्छे निर्णय भी होते हैं और बुरे निर्णय भी होते हैं. यह हमेशा से होता आया है.’

‘जेल नियम, जमानत अपवाद’
हाल ही में वरिष्ठ वकील रेबेका जॉन ने कहा था कि ‘जमानत नियम है और जेल अपवाद’ के न्यायिक सिद्धांत को पलटकर कर ‘जेल नियम और जमानत अपवाद’ कर दिया गया है.

कठोर यूएपीए कानून के तहत जमानत न मिलने के चलन पर व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि यूएपीए कानून की धारा 43डी (5) के तहत जमानत मिलना लगभग असंभव हो चुका है और जो अपवाद हैं, अब उन्हें चलन बना दिया गया है.

उन्होंने कहा, ‘जमानत देने को आपराधिक कानून के तहत सब कुछ खत्म होने जैसा क्यों माना जाता है? मैं कहूंगी कि हर कोई जमानत का हकदार है.’

जॉन ने कहा आजकल पत्रकार अपनी स्टोरी लिखने से पहले कानूनी राय मांगते हैं, कि कहीं वे किसी कानून का उल्लंघन तो नहीं कर रहे हैं. उन्होंने कहा, ‘कई वरिष्ठ पत्रकार ट्वीट करने से पहले मुझे अपना ट्वीट भेजते हैं. ये किस तरह की सरकार है.’

पर्यावरण कार्यकर्ता दिशा रवि की गिरफ्तारी को लेकर उन्होंने कहा कि इस मामले में कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन किया गया और गलत तरीके से उन्हें पुलिस कस्टडी दी गई.

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