सोम. सितम्बर 23rd, 2019

इन देवताओं को भी दिया था शिव ने कठोर दंड, जानिए रोचक कहानी

इन देवताओं को भी दिया था शिव ने कठोर दंड, जानिए रोचक कहानी

महादेव भोलेभंडारी माने जाते हैं, लेकिन क्रोध आने पर उन्होंने देवताओं को भी दंडित किया था।

राष्ट्रीय जगत विजन: भोलेनाथ को सृष्टि का पालनकर्ता कहा जाता है। मान्यता है कि भोलेनाथ पवित्र भाव से की गई भक्ति से जल्द प्रसन्न हो जाते हैं और अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं। सावन मास उनकी कृपा पाने का विशेष मास है और शिवभक्त गण इस अवसर पर शिवपूजा का विशेष विधान करते हैं, लेकिन नाराज होने पर देवताओं को भी शिव के कोपभाजन का शिकार होना पड़ा है और महादेव ने उनको कठोर दंड देकर दंडित किया है,लेकिन शिव भोले भंडारी है इसलिए दंडित करने के बाद भी उन्होंने अपनी कृपादृष्टि से कोपभाजन का शिकार हुए देवताओं का उद्धार किया है।

पुत्र गणेश का काटा था मस्तक

एक बार जब गण नंदी ने देवी पार्वती की आज्ञा पालन में त्रुटि कर दी तो माता पार्वती ने नाराज होकर अपने शरीर के उबटन से बालक का निर्माण कर उसमें प्राण डाल दिए और उससे कहा कि तुम मेरे पुत्र हो और सिर्फ मेरी ही आज्ञा का पालन करोगे। देवी पार्वती ने कहा कि मैं मैं स्नान के लिए जा रही हूं इसलिए ध्यान रखना कोई भी अंदर न आने पाए। देवी पार्वती के स्नान के लिए जाते ही भगवान शिव वहां पर आ गए और देवी पार्वती के भवन में जाने लगे।

पार्वतीपुत्र ने विनयपूर्वक उनको रोकने का प्रयास किया तो शिव क्रोधित हो गए और उन्होंने अपने त्रिशूल से उस बालक का सिर काट दिया। देवी पार्वती को जब इस बात का पता चला तो वे शोकमग्न हो गई और क्रोधाग्नि से सृष्टि में हाहाकार मच गया। तब सभी देवताओं ने मिलकर भोलेनाथ की स्तुति की और बालक को पुनर्जीवित करने का निवेदन किया। तब भगवान शंकर के कहने पर विष्णुजी एक हाथी का सिर काटकर लाए और उस सिर को बालक के धड़ पर रखकर उसे जीवित कर दिया। भगवान शंकर व अन्य देवताओं ने पार्वतीपुत्र को गजमुख नाम देकर अनेक आशीर्वाद दिए।

क्रोधाग्नि में जल गए थे कामदेव

शिवपुराण के अनुसार शिव के क्रोध की ज्वाला में कामदेव भस्म हो गए थे। एक समय महाबली राक्षस तारकासुर ने अपने कठोर तप से ब्रह्मा जी को प्रसन्न करके ऐसा वरदान प्राप्त कर लिया था जिससे उसकी मृत्यु केवल शिव पुत्र द्वारा ही हो सकती थी। इस तरह से तारकासुर ने अरमत्व का वरदान प्राप्त कर लिया था। इस बात का पता जब देवताओं को चला तो वे सब बेहद चिंतित हो गए और उन्होंने भगवान शिव को समाधि से जगाने का निश्चय किया।

इस कार्य के लिए देवताओं ने कामदेव को चुना। शिव उस समय सती के आत्मदाह के बाद समाधि में लीन हो चुके थे। कामदेव ने शिव की समाधि से जागृत करने के काफी प्रयत्न किए, लेकिन सभी प्रयास व्यर्थ हो गए। उसके बाद कामदेव खुद आगे आए और आम के पेड़ के पत्तों के पीछे छुपकर शिवजी पर पुष्प बाण चलाया। पुष्प बाण सीधे भगवान शिव के हृदय पर लगा और उनकी समाधि टूट गई। अपनी समाधि टूटने से शिव क्रोधित हो गए और अपने त्रिनेत्र खोलकर उसकी अग्नि से कामदेव को जलाकर भस्म कर दिया। कामदेव की पत्नी अपने पति को भस्म होते देख काफी दुखी हुई और उन्होंने महादेव से अपने पति को जीवित करने का निवेदन किया। तब महादेव ने रति को आश्वासन दिया कि कामदेव द्वापर युग में श्रीकृष्ण के रूप में जन्म लेंगे।

ब्रह्माजी का काटा था सिर

शास्त्र अनुसार ब्रह्माजी ने सृष्टि के सृजन के दौरान एक अत्यंत सुंदर महिला को बनाया था। स्वयं ब्रह्मा अपनी रचना पर इतने मुग्ध थे कि उस महिला को पसंद करने लगे। महिला का नाम सतरूपा था। सतरूपा ने ब्रह्मा की दृष्टि से बचने की हरसंभव कोशिश की, लेकिन वह सफल नहीं हो सकी। उस समय सतरूपा में हजारों जानवरों में बदल जाने की शक्ति थी और उन्होंने ब्रह्मा जी से बचने के लिए यह सभी जतन किए भी, लेकिन ब्रह्माजी सतरूपा के प्रेम में इतने आसक्त हो गए थे कि उन्होंने जानवर रूप में भी उनको नहीं छोड़ा।

सतरूपा अब ब्रह्मा जी की नज़र से बचने के लिए ऊपर की ओर देखने लगीं, तो ब्रह्मा जी ने अपना एक सिर ऊपर की ओर विकसित कर लिया जिससे सतरूपा बेहद लाचार महसूस करने लगी। भगवान शिव ब्रह्मा जी की इस हरकत को देख रहे थे। शिव की दृष्टि में सतरूपा ब्रह्मा की पुत्री सदृश थीं, इसीलिए उन्हें यह घोर पाप लगा। उन्होंने क्रुद्ध होकर ब्रह्मा का सिर काट डाला ताकि सतरूपा को ब्रह्मा जी की कुदृष्टि से बचाया जा सके।

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