गुरु. अक्टूबर 17th, 2019

दंतेवाड़ा उप चुनाव में हुई देवती कर्मा की जीत के बाद मंत्री मंडल में फेरबदल के कयास जोरों पर तीन वर्तमान मंत्रीयों की हो सकती है छुट्टी,

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दंतेवाड़ा उप चुनाव में हुई देवती कर्मा की जीत के बाद मंत्री मंडल में फेरबदल के कयास जोरों पर तीन वर्तमान मंत्रीयों की हो सकती है छुट्टी,

देवती कर्मा के विधायक निर्वाचित होने के बाद सियासी गलियारों में उन्हें मंत्री बनाने की अटकलें बड़़ी तेज हो गई हैं। इसके पीछे ठोस तर्क भी दिए जा रहे….बस्तर का मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व बेहद कम और कमजोर है। सिर्फ एक। कवासी लकमा उद्योग और आबकारी विभाग संभाल रहे हैं। वहीं, सरगुजा और दुर्ग भिलाई से तीन मंत्री हैं। सबसे सीनियर टीएस सिंहदेव। फिर प्रेमसाय सिंह और नए मंत्री अमरजीत भगत। जाहिर है, सरकार मंत्रिमंडल में बस्तर का प्रतिनिधित्व बढ़ाना चाहेगी। और, सियासी दृष्टि से देवती से अच्छा कोई नाम नहीं हो सकता। बस्तर शेर कहे जाने वाले दिवंगत नेता महेंद्र कर्मा की पत्नी हैं। ट्राईबल भी और महिला भी। कहने के लिए हो जाएगा, भूपेश सरकार ने राज्य बनने के बाद पहली बार दो महिलाओं को मंत्रिमंडल में जगह दी। लेकिन, इसके लिए सरकार को मंत्रिमंडल में एक सर्जरी करनी होगी। क्योंकि, कोटा फुल है। 12 ही मंत्री बन सकते हैं। एक सीट खाली थी, उस पर अमरजीत को मौका मिल गया। वैसे, नगरीय निकाय चुनाव के बाद माना जा रहा है कि मंत्रिमंडल में एक सर्जरी होगी। इसमें दो-से-तीन मंत्री ड्रॉप हो सकते हैं। तीनों के परफारमेंस पुअर है। एक विकेट सरगुजा से गिरेगा। दो और नामों की चर्चा है।

ट्रेंगुलर मुकाबला

चीफ सिकरेट्री सुनील कुजूर को छह महीने का एक्सटेंशन देने के लिए सरकार ने केंद्र को रिमाइंडर भेजा है। उसमें बताया गया है कि वर्तमान सीएस को एक्सटेंशन देना क्यों जरूरी है। लिहाजा, अब सीके खेतान और आरपी मंडल के साथ ही सुनील कुजूर का नाम भी सीएस की दौड़ में शामिल हो गया है। हालांकि, पहले यह माना जा रहा था कि भारत सरकार आसानी से एक्सटेंशन देती नहीं। लेकिन, सरकार के रिमाइंडर से यह जाहिर हुआ है कि कुजूर को लेकर सरकार गंभीर है। बहरहाल, रिमाइंडर पर भारत सरकार क्या रुख अपनाती है यह आखिरी समय में ही तय होगा। जानकारों का कहना है, ऐसे केस में भारत सरकार लास्ट वीक या लास्ट दिन भी कई बार फैसले करती है। याने 31 अक्टूबर को कुजूर रिटायर होने वाले हैं तो उससे एक-दो दिन पहले सरकार का फैसला आएगा। यदि एक्सटेंशन मिलेगा तो लेटर आ जाएगा। और, नहीं तो 30 अक्टूबर तक वेट कर राज्य सरकार नए सीएस का ऐलान कर देगी। उससे पहिले सूबे में अटकलों का दौर जारी है। खासकर, ब्यूरोक्रेसी में इसको लेकर खूब गुणा-भाग किए जा रहे हैं। हालांकि, कैलकुलेशन का कोई मतलब नहीं। चीफ सिकरेट्री और डीजीपी वही बनता है, जिसके माथे पर लिखा होता है। वरना, कई आईएएस, आईपीएस बिना इस पद को इनज्वॉय किए बिदा नहीं हो गए होते। सुनील कुजूर भी भला कभी सोचे होंगे कि वे चीफ सिकरेट्री बन सकते हैं। और, एक्सटेंशन देने के लिए सरकार प्रयास करेगी। वे तो बेचारे अदद एक बढ़ियां विभाग के मोहताज थे। इसी तरह रिटायर डीजीपी एएन उपध्याय भी हैं। उनके जैसा दुनियादारी से दूर रहने वाले अफसर को सरकार डीजीपी बनाएगी, उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी। लेकिन, उपध्याय ने पोस्टिंग का रिकार्ड ही बना दिया। पूरे पौने पांच साल डीजीपी रहे।

मंत्री के लेटरहेड पर वसूली

स्कूल शिक्षा विभाग के ट्रांसफर में गोलमाल को लेकर सरकार ने मंत्री के ओएसडी और विशेष सहायक की छुट्टी कर दी। लेकिन, इसके बाद भी विभाग में नित नए कारनामे सामने आ रहे हैं। बताते हैं, स्कूल शिक्षा डायरेक्ट्रेट के स्थापना शाखा के एक अधिकारी ने डीईओ, बीईओ के ट्रांसफर के लिए दूसरे विभाग के एक मंत्री का लेटरहेड जुगाड़ लिया। और, जिसने पैसा दिया, उसके लिए उसी लेटरहेड पर मंत्री की तरफ से खुद ही ट्रांसफर की अनुशंसा कर आर्डर निकाल दिया। ताकि, कोई पूछ तो बता दें कि फलां मंत्रीजी ने रिकमांड किया था। स्कूल शिक्षा इससे बेखबर रहे। अफसर के खेल का भंडाफोड़ तब हुआ, जब लिस्ट में एक ही समुदाय के 70 परसेंट से अधिक लोग डीईओ, बीईओ बन गए। सरकार को इसकी जानकारी मिल गई है। जल्द ही स्कूल शिक्षा में तीसरा विकेट गिर जाए, तो आश्चर्य नहीं।

विवेकानंद का रिकार्ड

लांग कुमेर के बाद विवेकानंद बस्तर के पहिले आईजी होंगे, जिन्होंने वहां ढाई साल का लंबा कार्यकाल पूरा कर लिया है और अभी भी पिच पर जमे हुए हैं। वे ऐसे समय में बिलासपुर से बस्तर गए थे, जब बिलासपुर में आईजी बने उनका तीन महीना भी नहीं हुआ था। एसआरपी कल्लूरी को बस्तर से हटाने के बाद सरकार किसी उपयुक्त चेहरे की तलाश कर रही थी। उस समय तत्कालीन डीजीपी एएन उपध्याय ने सरकार को सुझाया कि विवेकानंद बस्तर के लिए बेहतर होंगे। इस बेहतर के फेर में विवेकानंद फंस गए। वरना, बस्तर गए अधिकांश आईजी साल, डेढ़ साल में जोर-जुगाड़ लगाकर रायपुर लौट आए। सिर्फ लांग कुमेर ही ऐसे आईपीएस थे, जो लंबे समय तक बस्तर में रहे। लेकिन, वे वैसा खुद चाह रहे थे। उन्हें हिन्दी का प्राब्लम था फिर वहां उन्होंने ऐसा कुछ जमा लिया था कि डीआईजी, आईजी और एडीजी बनने तक कुछ दिन वे बस्तर रेंज में रहे।

अमिताभ और सोनमणि

अमिताभ जैन जब दिल्ली डेपुटेशन से लौटे थे तो उस समय शेखर दत्त सूबे के गवर्नर थे। राज्य में भाजपा की सरकार थी और केंद्र में कांग्रेस की। शेखर दत्त ने मुख्यमंत्री डा0 रमन सिंह से अमिताभ जैन को सिकरेट्री के रूप में मांगा था। और, यह दूसरी बार हुआ कि राज्यपाल अनसुईया उईके ने मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को फोन कर सोनमणि बोरा सचिव के रूप में मांगा। और, मुख्यमंत्री ने इसमें तनिक भी देरी नहीं लगाई। सोनमणि का आदेश राजभवन के लिए जारी हो गया।

22 दिन का कार्यकाल

सोनमणि बोरा के लिए अखरने वाली बात यह रही कि सबसे कम दिन तक किसी विभाग में सिकरेट्री रहने का रिकार्ड उनके नाम दर्ज हो गया। सिर्फ 22 दिन। इस 22 दिन में एक बहुत बड़ा काम उन्होंने यह किया कि हाईकोर्ट में रिट दायर कर सहायक प्राध्यापकों की भरती पर लगी रोक उन्होंने हटवा दी। संस्कृति सचिव के रूप में ट्राईबल डांस को लेकर भी वे बड़ा तेजी से काम कर रहे थे। ये दोनों उनके हाथ से निकल गए। हालांकि, पहले भी राजभवन के साथ ही हायर एजुकेशन या किसी और विभाग का चार्ज अफसरों के पास हमेशा रहा है। वैसे, छत्तीसगढ़ राजभवन में सुनील कुजूर, आईसीपी केसरी, शैलेष पाठक, अमिताभ जैन सिकरेट्री रहे हैं। आरआर के रूप में सोनमणि का नाम भी इसमें जुड़ गया।

दुआ कीजिए!

हायर एजुकेशन में चार महीने में चार सिकरेट्री चेंज हो गए। 31 मई को सुरेंद्र जायसवाल रिटायर हुए थे। रेणु पिल्ले को उनकी जगह सिकरेट्री बनाया गया था। 9 सितंबर को उन्हें हटाकर सोनमणि बोरा को हायर एजुकेशन का दायित्व सौंपा गया। एक अक्टूबर को वे भी बिदा हो गए। अलरमेल मंगई डी अब उच्च शिक्षा की नई सिकरेट्री बनी हैं। इस विभाग के अधिकारियों, कर्मचारियों को कुछ अनुष्ठान वगैरह करना चाहिए। ताकि, मंगई कुछ दिन हायर एजुकेशन में बनी रहें।

अंत में दो सवाल आपसे

1. रायपुर के लोकल हनी के गिरफ्त में फंसे कितने आईएएस और आईएफएस के नाम इंटेलिजेंस ने सरकार को दिए हैं?
2. डिप्रेशन के शिकार किस आईएएस को उपचार कराने में मदद की बजाए आईएएस अफसर ही उनका मजाक उड़ा रहे हैं?

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